ध्यान –

“ध्यान” यह सुनने में तो छोटा सा शब्द है लेकिन इसको कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति के हाथ मे किसी भी वृक्ष के बीज दें और उसे पेड़ समझने की कल्पना करने को बोलें तो क्या व्यक्ति पूर्ण रूप से पेड़ की अनुभूति और स्थिति को उस बीज मात्र से समझ पायेगा।
जबकि ये निर्धारित है कि अगर उस बीज की पूर्ण रूप से देख रेख और सेवा की जाए तो कई वर्षों के बाद वो एक विशाल वृक्ष में बदल जायेगा और अपने जैसे अनगिनत बीज प्रदान करेगा।

मान लें अगर हमे पेड़ पौधों के विषय मे पूर्ण जानकारी नही होती और कोई इस प्रकार की बात करता कि ये छोटा सा बीज आगे चल के एक विशाल वृक्ष बन जाएगा और अपने जैसे अनगिनत बीज और वृक्षो को देने में सक्षम है तो हम उसे मजाके समझते और उस व्यक्ति को पागल की श्रेणी में डाल देते ,जबकि ये परम सत्य है।

हॉ आवश्यकता है तो बीज को वृक्ष बनने में लगने वाले समय,मेहनत और सेवा की ,अलग से कुछ करने की जरूरत नही वह स्वयम प्रकृति के दिव्य गुण और नियमो के तहत अपने स्वरूप को प्राप्त कर ही लेगा।

इसी प्रकार हम अगर ध्यान के बारे में लाख अनुभव और बाते बताएं लेकिन वह तब तक नही समझा जा सकता जब तक उसके पीछे समय और अभ्यास न दिया जाए।व्यक्ति को अलग से कुछ भी करने की या सीखने की आवश्यक्ता नही ,प्रकृति उसके अभ्यास अनुसार उसे उस स्थिति में स्वयम पहुचा देगी जिस स्थिति की बातें ध्यान के दौरान शास्त्रों में बताई गई है।

अतः इस बात को गांठ बांध लें ध्यान का बताया गया मूल अभ्यास का धैर्यपूर्वक अभ्यास करें खुद की सेवा करें और समय दें,प्रकृति स्वयं सबकुछ दे देगी।

इस प्रकार करे ध्यान का अभ्यास –

अभ्यास के लिए आप क्या खाते हैं,क्या पीते है कौन सा व्यवसाय करते है आदि बातों से कोई महत्व नही रखता।
आपको केवल अपनी दिनचर्या सुधारने की ज़रूरत है। जो यह काम अपनी सुविधा के अनुसार कर सकते हैं।
जो बुराई होगी वह अभ्यास करते करते स्वतः ही छूट जाएगी।
मान लें कि आप चाय बनाने जा रहे हैं। चाय बनाने के लिए ज़रूरी नही है कि इसके लिए खूब सुबह उठ जाएं,नित्य क्रिया करें एवं अपने इष्ट को धूप अगरबत्ती दिखाएं आदि। चाय आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी वक्त बना सकते हैं। उसी प्रकार ध्यान के अभ्यास के लिए कोई बंधन नही है। स्वतंत्र और प्रसन्नता के साथ ध्यान करना सीखें। अभ्यास करें।
ध्यान के लिए उपयुक्त समय बहुत सुबह या शाम या रात्रि बेल बताया गया है, पर इससे भाग दौड़ भारी ज़िंदगी में सभी उक्त समय का ध्यान नही रख पाते। अतः ध्यान करने का उपयुक्त समय आप अपनी दिनचर्या के अनुसार कर सकते हैं।
ध्यान करते समय आपका पेट भारी न हो अर्थात भोजन करने के तुरंत बाद ध्यान में न बैठें।
भोजन करने के चार घंटे बाद ध्यान किया जा सकता है।
हल्का नष्ट भी अगर आपने किया हो तो एक घंटे का अंतर अवश्य रखना चाहिए ध्यान के लिए।
ध्यान करते वक्त मन को श्वांस के साथ लगाने का निर्देश मिलता है। यह बात सभी के लिए अनुकूल सिद्ध नही होती। अतः अपनी स्थिरता पर ही बने रहें।
कुछ दिनों बाद आपको स्वयं ज्ञान हो उठेगा की कैसे क्या करना है। तब आप किसीके निर्देशों के बंधन में न रहें। अपने अंतर्ज्ञान का ही उपयोग करें। कुछ कठिनाइयों का भी अनुभव करेंगे परंतु उन्न कठिनाइयों पर कैसे विजय प्राप्त करनी है इसका ज्ञान भी स्वतः हो जाएगा। तब आपका मन ही आपका सच्चा गुरु सिद्ध होगा। तब आप किसीके भी विचारों के बंधन में न रहें। स्वतंत्र रहें।

ध्यान करने की क्रिया की शुरुआत ऐसे करें।

अपनी दिनचर्या में से उपयुक्त समय निकालें।
ऊनी कम्बल को मोड़कर इससे प्रकार समतल बिछा लें कि आराम पूर्वक बैठ सकें और बदन का कोई भी हिस्सा भूमि के संपर्क में न हो। आपके अंग कम्बल के आसन पर ही टिके हुए हों।
आराम से पद्मासन में बैठें। यदि पद्मासन में न बैठ सके तो सुखासन में बैठें। दोनों हथेलियों को गोद में रखें। बायीं हथेली के ऊपर दाहिनी हथेली रखें। एकदम सीधा बैठें। मेरुदंड सीधा रहे गर्दन भी सीधा। आंख बंद कर लें। इसी स्थिति में रहें। एक बार चेक कर लें कि इस तरह बैठे हुए कहीं मांसपेशियों में तनाव तो नहीं। क्योंकि आपको तनावरहित बैठना है। बदन सीधा रखते हुए ही बैठना है और तनाव मुक्त भी रहना है।इस बात का ध्यान रखें। जब आप इससे स्थितो में बैठ लें तो इसी स्थिति को बनाएं रखें।
एकदम मूर्ति की तरह स्थिर बैठे रहें और ज़रा भी हिले नहीं।
पंद्रह दिनों तक तीन मिनट तक इस स्थिति का अभ्यास करें। उसके बाद दस सेकंड प्रति तीन दिन पर अभ्यास बढ़ाते रहें और जब पंद्रह दिन तक पहुच जाएं तो कुछ बातों पर ध्यान दें।
जब शरीर की स्थिरता का अभ्यास बढ़ेगा तब मन भी धीरे धीरे स्थिर होना आरम्भ हो जाएगा अतः नींद आ सकती है परंतु नींद को आने नहीं देना है। सजगता बनाये रखना है।
मन स्थिर होने के बाद बीच बीच में इधर उधर जाए तो चार-पांच बार नाड़ीशोधन प्राणायाम करें – यह उत्तम प्रकार का हो। जब इसे उत्तम रूपों में किया जाता है तो इसे उत्तम प्राणायाम भी कहते हैं।
इस प्रक्रिया में यदि आप चार सेकंड में एक गहरा स्वांस लेते हैं तो श्वांस को अंदर ही सोलह सेकंड के लिए रोकना होता है और तब धीरे धीरे आठ सेकंड में छोड़ना पड़ता है।
श्वांस लेना रोकना और छोड़ना सब एक लय में करना होता है।
इसे कर लेने के बाद पुनः ध्यान की स्तिथि में बैठना होता है।
ध्यान रहे,जब शरीर की स्थिरता का अभ्यास होता है तो मन की स्थिरता का अभ्यास भी स्वतः ही होने लगता है। मन को स्थिर करने का अभ्यास अलग से नही किया जाता। मन की स्थिरता के कारण उन्न देवी देवताओं के दर्शन हो सकते हैं जिनके बारे में आपने सुना या पढ़ा है। इस प्रकार के दर्शन से आप प्रभावित न हों,यह इससे बात का सूचक है कि आपकी प्रगति हो रही है। यदि आप इन्ही दर्शनों में फस जाएंगे तो आपकी प्रगति रुक सकती है।
धीरे धीरे ध्यान का अवधिकाल बढ़ाएं।

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